प्रयागराज, लगातार बारिश के बाद भी सलोरी का दधिकान्दो मेला ऐसे जगगमगाया
प्रयागराज का दधिकान्दो मेला एक ऐतिहासिक और धार्मिक आयोजन है, जो श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के छठे दिन से शुरू होता है। इसका इतिहास 1890 से शुरू होता है, जब तीर्थ पुरोहित रामकैलाश पाठक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विजय चंद्र, और सुमित्रा देवी ने इसे ब्रिटिश शासन के खिलाफ जनमानस को एकजुट करने और आजादी की भावना जगाने के लिए शुरू किया। इसका उद्देश्य अंग्रेजों के प्रति भय को दूर कर लोगों को स्वतंत्रता संग्राम के लिए प्रेरित करना था।
मुख्य विशेषताएं:
प्रारंभ: 1890 में चांदपुर सलोरी से शुरू, बाद में कीडगंज, तेलियरगंज, सुलेमसराय, और राजापुर जैसे क्षेत्रों में विस्तार।
स्वरूप: मशाल और लालटेन की रोशनी में श्रीकृष्ण-बलदाऊ की सवारी निकाली जाती थी, जो भक्तों के कंधों पर चलती थी। अब यह राजसी ठाठ-बाट के साथ चांदी के हौदे में हाथी पर सवार होकर निकलती है।
सांस्कृतिक महत्व: ‘दधिकान्दो’ का अर्थ है दही क्रीड़ा, जो श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं पर आधारित है। यह मेला सामाजिक सरोकारों जैसे बेटी बचाओ, पर्यावरण संरक्षण, और आत्मनिर्भर भारत जैसे संदेशों को भी बढ़ावा देता है।
विकास: समय के साथ मेला भव्य हुआ, जिसमें बिजली की सजावट, झांकियां, और सामाजिक मुद्दों पर आधारित चौकियां शामिल हुईं। 1922 और 1927 में ब्रिटिशों ने इस पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की, लेकिन जनता ने परंपरा जारी रखी।
वर्तमान स्थिति: आज यह मेला हजारों लोगों को आकर्षित करता है, विशेषकर चांदपुर सलोरी में, जहां यह भव्य शोभायात्राओं और लाइटिंग-साउंड प्रतियोगिताओं के साथ आयोजित होता है।….
📸 झांकियां को और साउंड सिस्टम और बेहतरीन लाइटिंग करने वालों को इनाम के रूप में ट्रॉफी और सम्मानित करते हुए कुछ धनराशि वितरित की जाती है रात्रि के समय मेला अपने चरणों उत्कर्ष पर होता
