जाने इस पूजा को ललही छठ कियु कहा जाता है

बिहार में मनाए जाने वाले छठ पूजा के बारे में सब जानते हैं लेकिन आइए जानते हैं ललही माई कि पूजा…. के बारे में
ललही पूजा माता द्वारा पुत्र के आयु और स्वास्थ्य की कामना हेतु की जाने वाली विशेष पूजा है इस दिन घर में पंडित जी छूल, काश, बैर, को लेकर घर-घर आते हैं और उसे गाडते है और इसके चारों ओर ताला बनाकर नहा कर हम लोग पानी दे देते है… अब घर में सुबह से ही इसके पूजा की तैयारी शुरू हो जाती है महुआ को एक नए चूल्हे में आग जलाकर एक पत्र (बटुए) में चुराया जाता है और इसी महुआ का प्रसाद के रूप में भोग भी लगाया जाता है|
महुआ चूर जाने के बाद, महुआ के पत्ते का दनोखा बनाकर उसी में महुआ रखते हैं महुआ के पत्ते से बना दोना में महुआ और दही का प्रसाद माता अपने पुत्र की संख्या के हिसाब से… रखतीं है
एक पुत्र के लिए 12 दोना प्रसाद चढ़ाती है। जैसे जिनके दो पुत्र हैं वह दो बारहा यानी 24 दोना प्रसाद (महुआ और दही) का चढ़ते हैं…
इस दौरान ग्रामीण परिवेश में बड़े परिवारों की महिलाएं एक साथ मिलकर इस पूजा में भाग लेती है
और अपने-अपने पुत्रों के लिए सुरक्षा, दीर्घायु का आशीर्वाद प्राप्त हो, संतान को रोग, भय और अनिष्ट से मुक्ति मिले घर-परिवार में सुख-शांति और समृद्धि की कामना करते हुए ललही माइ कि पूजा करती है इस पूरी पूजा में सुबह से महिलाएं व्रत रहती है इस दौरान वह दातुन भी महुआ के शाखा का करती है और पूरे विधि विधान और स्वच्छता के साथ इस पूजा में भाग लेती है दोपहर में पूजा के बाद महुआ दही का सेवन करती है इस दौरान कई बुजुर्ग महिलाएं कई किस्से कहानियां भी कहती हैं…

हलषष्ठी व्रत, जिसे ललही छठ या चंदन छठ भी कहा जाता है, मुख्य रूप से उत्तर भारत में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण पर्व है। यह व्रत भाद्रपद महीने की कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है और इसे विशेष रूप से महिलाओं द्वारा संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाता है। बलराम जी का मुख्य शस्त्र हल और मूसल है इसलिए उन्हें हलधर भी कहा जाता है और उन्हीं के नाम पर इस पावन पर्व का नाम हलषष्ठी पड़ा है।

जन श्रुतियों में व्याप्त व्रत की कथा
हल षष्ठी व्रत की कथा के अनुसार, एक बार भगवान श्रीकृष्ण के भाई बलराम जी के जन्म से पहले माता रोहिणी ने यह व्रत रखा था। इस व्रत के प्रभाव से ही बलराम जी को अत्यधिक बलशाली और दीर्घायु होने का वरदान मिला।
एक अन्य कथा के अनुसार एक ग्वालिन दूध दही बेचकर अपना जीवन व्यतीत करती थी। एक बार वह गर्भवती दूध बेचने जा रही थी तभी रास्ते में उसे प्रसव पीड़ा होने लगी। इस पर वह एक झरबेरी पेड़ के नीचे बैठ गई और वहीं पर एक पुत्र को जन्म दिया।

ग्वालिन को दूध खराब होने की चिंता थी इसलिए वह अपने पुत्र को पेड़ के नीचे सुलाकर पास के गांव में दूध बेचने के लिए चली गई। उस दिन हलछठ का व्रत था और सभी को भैंस का दूध चाहिए था लेकिन ग्वालिन ने लोभवश गाय के दूध को भैंस का बताकर सबको दूध बेच दिया। इससे छठ माता को क्रोध आया और उन्होंने उसके बेटे के प्राण हर लिए। ग्वालिन जब लटकर आई तो रोने लगी और अपनी गलती का अहसास किया। इसके बाद सभी के सामने उसने अपना गुनाह स्वीकार कर पैर पकड़कर माफी मांगी। इसके बाद हर छठ माता प्रसन्न हो गई और उसके पुत्र को जीवित कर दिया। इस वजह से ही इस दिन पुत्र की लंबी उम्र की कामना से हलछठ का व्रत व पूजन किया जाता है।

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